17 मई 2015

मस्ती भरे बचपन की यादें




ऐसा था मेरा बचपन जैसे मस्ती की  मालगाड़ी
  हर डिब्बे में थी एक नई मजेदार कहानी
किसी में बहती नदिया का कल-कल पानी
तो किसी में अमिया के बगिया की कहानी

ऐसा था मेरा बचपन जैसे मस्ती की मालगाड़ी
सुनी-सुनाई नहीं मेरी अपनी है यह कहानी
खिलखिलाता ऐसा बचपन था सुनो मेरी जुबानी
नानी के गांव में बीते गर्मी की छुट्टियों की है यह कहानी


ऐसा था मेरा बचपन जैसे मस्ती की मालगाड़ी
ज्येष्ठ की दुपहरिया में पेड़ों पर चढ़ लखनि खेलने की है यह कहानी
धूप से लाल आँखों पर नीम के पत्तियों की पट्टी बांधती याद आतीं हैं नानी
 चुपके से कच्ची अमिया और खट्टी इमली खाने की है कहानी


                                                           
                                  

                                                                                           
ऐसा था मेरा बचपन जैसे मस्ती की मालगाड़ी
बँसवारीके पत्तों की चरमर में छिपने-छिपाने की है यह कहानी
यादों के झरोखों में दिख रही है आज भी कुछ निशाानी
ट्यूबवेल के पानी में छपछपाते बचपन की है यह कहानी

                                                                           
ऐसा था मेरा बचपन जैसे मस्ती की मालगाड़ी
खेत -खलिहानों में भूसे के ढेरों पर कूदने-फाँदनेकी है यह कहानी
नदियों में दुप्पट्टे का जाल बना मछली पकड़ने की थी तरक़ीब मस्तानी
गाय के नए जन्मे बछड़े को देखने के कौतूहल की है यह कहानी


ऐसा था मेरा बचपन जैसे मस्ती की मालगाड़ी
आज सारी बातें बनकर रह गई है बस एक कहानी
अब बच्चों को ऐसी मस्ती नहीं लगती लुभानी
कंप्यूटर और मोबाईल की दुनिया में सिमट गई है सारी कहानी